Bhopal News: शाखा से मोबाइल तक पहुंची बैंकिंग, साइबर ठगों ने भी बदला खेल, हर मोड़ पर नए खाते का उपयोग: 32 माह में 1.55 लाख लोगों के 1,402 करोड़ उड़ाए
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Bhopal News: शाखा से मोबाइल तक पहुंची बैंकिंग, साइबर ठगों ने भी बदला खेल, हर मोड़ पर नए खाते का उपयोग: 32 माह में 1.55 लाख लोगों के 1,402 करोड़ उड़ाए

राजनीतिक क्रांति, भोपाल 
 साइबर ठगी अब केवल बड़ी रकम की वारदात नहीं रह गई है, बल्कि डिजिटल बैंकिंग के तेजी से विस्तार के साथ छोटी-छोटी रकम वाले फ्रॉड की शिकायतें भी बड़ी संख्या में सामने आ रही हैं. राज्य में 31 अगस्त 2026 तक साइबर ठगी की 52,232 शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं. यह आंकड़ा पूरे 2025 में दर्ज 55,382 शिकायतों के बेहद करीब पहुंच गया है. हालांकि इस अवधि में दर्ज ठगी की रकम 305.32 करोड़ रुपए है, जो 2025 के पूरे साल की 632.45 करोड़ रुपए की तुलना में काफी कम है. तीन साल के आंकड़ों को साथ रखकर देखें तो शिकायतों और ठगी की रकम में अलग-अलग रुझान दिखाई देते हैं. वर्ष 2024 में 47,810 शिकायतों में 464.45 करोड़ रुपए, 2025 में 55,382 शिकायतों में 632.45 करोड़ रुपए और 2026 में 31 अगस्त तक 52,232 शिकायतों में 305.32 करोड़ रुपए की ठगी रिपोर्ट हुई. उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर प्रति शिकायत औसत दर्ज रकम 2024 में करीब 97 हजार रुपए, 2025 में करीब 1.14 लाख रुपए और 2026 में अब तक करीब 58.5 हजार रुपए बैठती है. यह बदलाव साइबर अपराध के स्वरूप में बदलाव का संकेत देता है. मतलब कम रकम की साइबर ठगी अधिक हो रही हैं. दस साल पहले जिस काम के लिए बैंक शाखा या एटीएम तक जाना पड़ता था, वह अब मोबाइल से कुछ सेकंड में हो रहा है. यही सुविधा साइबर अपराधियों के लिए भी रकम को तेजी से एक खाते से दूसरे खाते में भेजने का रास्ता बन गई है. प्रदेश में शिकायतों का बढ़ता आंकड़ा और साइबर जांच के सीमित विशेषज्ञ अमले के बीच तकनीकी क्षमता बढ़ाना अब साइबर अपराध से निपटने की व्यवस्था का अहम हिस्सा बन गया है.

2016 बनाम 2026: बैंकिंग की बदली तस्वीर  
दस साल में बैंकिंग का चेहरा बदला, अपराध का रास्ता भी बदला. 2016 के आसपास बैंकिंग में शाखा, एटीएम, चेक और पारंपरिक बैंक ट्रांसफर प्रमुख माध्यम थे. आज मोबाइल बैंकिंग, इंटरनेट बैंकिंग, यूपीआई, आईएमपीएस, एनईएफटी, आरटीजीएस और क्यूआर आधारित भुगतान रोजमर्रा के लेन-देन का हिस्सा हैं. यूपीआई इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. एनपीसीआई के अनुसार अगस्त 2026 में यूपीआई पर 24,508.96 मिलियन यानी करीब 2,450.9 करोड़ लेन-देन हुए और इनका कुल मूल्य करीब 29.82 लाख करोड़ रुपए रहा. यानी औसतन करीब 79 करोड़ लेन-देन प्रतिदिन. यूपीआई की शुरुआत ही अप्रैल 2016 में पायलट लॉन्च के साथ हुई थी.

तीन साल में साइबर ठगी
वर्ष शिकायतें ठगी की रकम     प्रति शिकायत औसत
2024 47,810      464.45 करोड़ करीब  97 हजार
2025 55,382 632.45 करोड़ करीब  1.14 लाख
2026 52,232 305.32 करोड़ करीब   58.5 हजार

साइबर अपराध बनाम अमला
-1.55 लाख-2024 से 31 अगस्त 2026 तक शिकायतें
-1402 करोड़ इसी अवधि में रिपोर्टेड ठगी
-290 साइबर पुलिस के स्वीकृत पद
-करीब 30 रिक्त पद
– प्रदेश में सिर्फ 1 साइबर क्राइम पुलिस थाना
-27 प्रस्तावित तकनीकी कंसल्टेंट
-1,074  प्रशिक्षित साइबर वॉरियर

60 प्रतिशत कॉल रिसीव नहीं कर पाता अमला
प्रदेश में साइबर पुलिस के 290 स्वीकृत पद हैं, जिनमें करीब 30 पद रिक्त हैं. इनमें साइबर मुख्यालय, जोनल कार्यालय, साइबर थाना और फोरेंसिक लैब का अमला शामिल है. प्रदेश में केवल एक साइबर क्राइम पुलिस थाना दर्ज है. इसके मुकाबले उत्तर प्रदेश में 75, तमिलनाडु में 54 और महाराष्ट्र में 47 साइबर क्राइम पुलिस थाने हैं. प्रदेश में 1930 हेल्पलाइन पर रोजाना करीब 700-800 कॉल आते हैं. 60 प्रतिशत कॉल को रिसीव नहीं कर पाता अमला. भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर और उज्जैन में क्षेत्रीय कॉल सेंटर के जरिए प्रतिक्रिया व्यवस्था शुरू की गई. करीब 3 हजार से अधिक पुलिस बल की आवश्यकता है.  

हर ठगी के पीछे एक जैसा नेटवर्क
-फर्जी सिम: दूसरे व्यक्ति के दस्तावेजों या गलत तरीके से हासिल सिम का इस्तेमाल.
-फर्जी बैंक खाते: किराए पर लिए या फर्जी दस्तावेजों से खोले गए खाते.
-म्यूल अकाउंट: ठगी की रकम को कुछ समय के लिए रखने और आगे भेजने वाले खाते.
-तेजी से रकम ट्रांसफर: पैसा एक खाते में रुकने के बजाय कई खातों में बांटा जाता है.
-विदेशी नेटवर्क: कई मामलों में कॉल, डिजिटल ठगी और रकम का संचालन विदेश में बैठे नेटवर्क से जुड़े होने की जांच सामने आती है.
-अंतिम तक पहुंचना मुश्किल: कई खातों और डिजिटल माध्यमों से रकम घूमने के कारण मूल संचालक तक पहुंचना मुश्किल होता है.

अवसाद की चपेट में 90 फीसदी पीडि़त
साइबर ठगी का सबसे दर्दनाक पहलू आर्थिक नुकसान के बाद सामने आने वाला मानसिक दबाव है. नवभारत ने साइबर ठगी के शिकार 30 पीडि़तों से फोन पर बातचीत की. इनमें से 27 लोगों ने ठगी के बाद तनाव, चिंता और अवसाद जैसी स्थिति से गुजरने की बात कही. यानी बातचीत में शामिल करीब 90 फीसदी पीडि़तों ने मानसिक परेशानी बताई. कई पीडि़तों ने यह भी कहा कि आर्थिक नुकसान के बाद उन्हें परिवार के सदस्यों की नाराजगी और तानों का सामना करना पड़ा. कुछ लोगों ने बताया कि ठगी की रकम वापस नहीं मिलने की चिंता ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी