MP News: 50 हजार की रिश्वत में गिरफ्तारी, 24 साल बाद इंजीनियर को 5 साल की सजा; लोकायुक्त की जांच में आय से 213.75 प्रतिशत अधिक संपत्ति मिली थी, कोर्ट ने 25 लाख रुपए का जुर्माना लगाया, सजा के बाद जेल भेजा
भोपाल। 24 साल पहले 50 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गए तत्कालीन कार्यपालन यंत्री कैलाशचंद परवाल को मंडलेश्वर की स्पेशल कोर्ट ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में दोषी करार दिया है। प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश राजकुमार चौहान ने आरोपी को 5 साल के कारावास और 25 लाख रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई। फैसला होते ही अदालत में मौजूद आरोपी को उपजेल मंडलेश्वर भेज दिया गया। मामले की शुरुआत 6 सितंबर 2002 को हुई थी। धार निवासी शैलेन्द्र जोशी ने लोकायुक्त पुलिस से शिकायत की थी कि पीएचई खरगोन में तत्कालीन कार्यपालन यंत्री कैलाशचंद परवाल ने उनसे 50 हजार रुपए रिश्वत की मांग की है। शिकायत के बाद लोकायुक्त टीम ने जाल बिछाया और इंजीनियर को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। जांच आगे बढ़ी तो लोकायुक्त को उसकी संपत्ति को लेकर भी संदेह हुआ। इसके बाद खरगोन, देवास और इंदौर स्थित उसके ठिकानों पर छापे मारे गए। तलाशी में बैंक खातों, बीमा पॉलिसियों, निवेश और अन्य संपत्तियों से जुड़े दस्तावेज मिले। इसके आधार पर 8 सितंबर 2002 को आय से अधिक संपत्ति का अलग प्रकरण दर्ज किया गया।
34.64 लाख की आय, संपत्ति मिली 1.08 करोड़
लोकायुक्त की जांच में सामने आया कि 1 अगस्त 1981 से 8 सितंबर 2002 के बीच कैलाशचंद परवाल को वेतन और भत्तों के रूप में कुल 34 लाख 64 हजार 528 रुपए प्राप्त हुए थे। वहीं जांच में उसके पास करीब 1 करोड़ 8 लाख 70 हजार रुपए की संपत्ति, नकदी, जेवर और बैंक बैलेंस का पता चला। जांच के मुताबिक, आरोपी के पास उसकी ज्ञात आय से 213.75 प्रतिशत अधिक अनुपातहीन संपत्ति थी। इसके बाद लोकायुक्त पुलिस ने अदालत में चालान पेश किया।
131 गवाह, 500 से ज्यादा दस्तावेज बने आधार
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने करीब 131 गवाहों के बयान दर्ज कराए और 500 से अधिक दस्तावेज साक्ष्य के रूप में पेश किए। वहीं आरोपी ने भी अपने बचाव में 190 गवाहों की सूची और करीब 350 दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत किए। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर कैलाशचंद परवाल को दोषी माना और पांच साल की सजा के साथ 25 लाख रुपए का जुर्माना लगाया।
संयोग: 8 को केस दर्ज हुआ, 8 को ही फैसला
इस मामले में एक संयोग भी सामने आया। रिश्वत के मामले में कार्रवाई 6 सितंबर 2002 को शुरू हुई थी और आय से अधिक संपत्ति का प्रकरण 8 सितंबर 2002 को दर्ज हुआ था। अदालत का फैसला भी 8 सितंबर को ही आया, यानी मामले की शुरुआत के करीब 24 साल बाद। प्रकरण में लोकायुक्त की ओर से लोक अभियोजक प्रकाश सोलंकी ने पैरवी की।
